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वैराग्य क्या है और कैसे हो ?
संसार में प्रायः लोग वैराग्य के वास्तविक अर्थ को समझे बिना ही स्वयं को विरक्त मानकर इस भ्रम में जीते रहते हैं कि हम भक्ति के क्षेत्र में बहुत आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन ऐसे वैराग्य से आध्यात्मिक पथ पर हमारी उन्नति नहीं हो सकती। अतएव जिज्ञासु साधक को वैराग्य का स्वरूप भलीभाँति समझकर उसे दृढ़ से दृढ़तर करते जाना होगा तभी लाभ मिल सकता है। हमारे शास्त्रों में वैराग्य के दो प्रकार बताये गए हैं।
Read Moreभागवत में श्री राधा का वर्णन क्यों नहीं है?
कुछ भोले-भाले लोग जिन्हें किसी वास्तविक संत का सान्निध्य प्राप्त नहीं है वे ऐसी शंका करते हैं कि श्री राधा का वर्णन भागवत में क्यों नहीं है? श्रीमद्भागवत तो सर्वश्रेष्ठ महापुराण है जिसमें श्री कृष्ण लीलाओं का विशेष निरूपण किया गया है फिर उसमें कहीं राधा तत्त्व का निरूपण क्यों नहीं है? श्रीमद्भागवत तो सबसे प्रमुख ग्रंथ है जो समस्त वेदों-शास्त्रों का निचोड़ है।
Read Moreमन हमारा शत्रु भी मित्र भी
हमारे शास्त्रों में मनुष्य की एकादश इंद्रियाँ बताई गई हैं। इनमें से पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं - आँख, नाक, कान, त्वचा, रसना एवं पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं - हाथ, पैर, वाणी, मल विसर्जन और प्रजनन की इन्द्रियाँ। ग्यारहवीं इन्द्रिय है, ‘मन‘। इसी मन की अलग-अलग अवस्थाओं को ही बुद्धि, चित्त, अहंकार भी कहा गया है और इन्हीं सबको मिलाकर अंतःकरण भी कहा जाता है।
Read Moreराधागोविन्द पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा सरकारी उच्च माध्यमिक विद्यालय में कंप्यूटर लैब एवं पुस्तकालय की स्थापना
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज की प्रचारिका सुश्री श्रीधरी दीदी की अध्यक्षता में संचालित राधागोविन्द पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट, जयपुर द्वारा नेवटा स्थित राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में 14 कंप्यूटर, कंप्यूटर टेबल, चेयर्स सहित कंप्यूटर लैब की स्थापना की गयी है |
Read Moreगीता जयंती के पावन पर्व पर जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज की प्रचारिका सुश्री_श्रीधरी दीदी द्वारा बधाई संदेश।
आनंदकंद सच्चिदानंद श्रीकृष्णचंद्र चरणारविंद मकरंद मिलिंद महानुभाव !
आप सभी को गीता जयंती के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनायें । मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की एकादशी का दिन श्रीमद्भगवद्गीता जयंती के रूप में प्रतिवर्ष मनाया जाता है ।
मृत्यु के समय भगवान का नाम कौन ले सकता है?
प्रायः भोले-भाले लोग अजामिल का उदाहरण देकर कहते हैं कि मृत्यु के समय भगवान का नाम लेने से भगवान का लोक प्राप्त होता है। कई कथावाचकों इत्यादि के द्वारा अजामिल के उद्धार का आख्यान भ्रामक तरीके से लोगों के बीच में प्रचारित किया गया
Read Moreजीवन पानी के बुलबुले के समान है !
कितने आश्चर्य की बात है कि दिन रात मिथ्या अहंकार में जीता हुआ ये मनुष्य अपने चारों ओर मृत्यु का तांडव देखते हुए भी अपनी मृत्यु को भूल जाता है। महाभारत में जब एक यक्ष ने युधिष्ठिर से प्रश्न किया - 'किमाश्चर्यं ?' संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है ?
Read Moreराधारानी का दरबार सबसे ऊँचा क्यों?
सर्वोच्च रस की प्राप्ति के लिए माधुर्य भाव-युक्त भक्ति में महारसिकों का अधिक झुकाव श्री राधारानी के प्रति होता है। हमारे शास्त्रों में भी श्री राधारानी के प्रति अधिक अनुराग करने के कथन कई स्थानों पर मिलते हैं -
Read Moreपरदोषदर्शी नहीं स्वदोषदर्शी बनें
हमारा पूरा जीवन कितना खोखला है, हम स्वयं अनंत दोषों के भंडार हैं लेकिन फिर भी हमारा पूरा जीवन दूसरों के दोषदर्शन में यानि उनके अवगुण देखने में, कथन करने इत्यादि में ही व्यतीत हो जाता है। हमें गंभीरतापूर्वक इस विषय में विचार करना चाहिए कि दूसरों के दोष देखने या उनकी निंदा इत्यादि
Read Moreमृत्यु के समय भगवान का नाम कौन ले सकता है ?
प्रायः भोले-भाले लोग अजामिल का उदाहरण देकर कहते हैं कि मृत्यु के समय भगवान का नाम लेने से भगवान का लोक प्राप्त होता है। कई कथावाचकों इत्यादि के द्वारा अजामिल के उद्धार का आख्यान भ्रामक तरीके से लोगों के बीच में प्रचारित किया गया
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