भगवान अवतार क्यों लेते हैं ?

August 27, 2019

         

इस संसार में दो प्रकार के लोग हैं। एक आस्तिक जो ईश्वर की सत्ता में विश्वास रखते हैं और दूसरे हैं नास्तिक जो भगवान की सत्ता को नकार देते हैं। आस्तिकों के भी दो प्रकार हैं, एक निराकारवादी और दूसरे साकारवादी। निराकारवादी कहते हैं ईश्वर निर्गुण-निर्विशेष- निराकार ही है और साकारवादी कहते हैं ईश्वर सगुण-सविशेष- साकार ही है। लेकिन वेद के अनुसार ईश्वर निराकार भी है और साकार भी है। ब्रह्म के दो स्वरूप होते हैं –

द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे मूर्तं चैवामूर्तं च।
(वृहदारण्यकोपनिषद् : 2-3-1)

 

और भगवान अपने साकार स्वरूप से इस जगत में बारम्बार अवतार भी लेते हैं। ऐसे में कुछ लोगों के मस्तिष्क में आस्तिक होते हुए भी  और सगुण साकार भगवान को मानने पर भी यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि आखिर भगवान को साकार बनकर अवतार लेने की आवश्यकता क्या है ? जब वह सर्वसमर्थ हैं तो बिना अवतार लिये भी , बिना इस प्राकृत जगत में आये भी सब कार्य कर सकते हैं। फिर इस मायिक जगत में अवतार लेकर क्यों आते हैं ?

 

इसी का रहस्य समझना है। वैसे तो भगवान के अवतार लेने के अनंत कारण होते हैं, उन्हें कोई सीमा में नहीं बाँध सकता। इसीलिए तुलसीदास जी ने कहा –

हरि अवतार हेतु जेहि होई,
इदमित्थं कहि जात सोई।

 

अर्थात् अवतार संबंधी प्रयोजन ‘यही है, इतना ही है’ यह कहना अनधिकार चेष्टा है। उसका वास्तविक मर्म तो अवतारी ही समझ सकता है लेकिन फिर भी अपनी-अपनी रुचि के अनुसार कई कारण  अवतार के बताये जाते हैं। भगवान ने स्वयं  भी अपने आने का कारण स्पष्ट किया है –

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्

(गीता : 4-7)

परित्राणाय साधूनां विनाशाय दुष्कृताम्
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे

(गीता : 4-8)

 

अर्थात् दैत्यों के नाश,साधुओं की रक्षा एवं धर्म की संस्थापना के लिए मैं अवतार लेता हूँ।

वेदव्यास जी ने भागवत में एक और प्रमुख  कारण बताया –

तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम्
भक्तियोग विधानार्थं कथं पश्येम हि स्त्रियः

(भागवत : 1-8-20)

 

अर्थात् निर्गुण-निर्विशेष-निराकार ब्रह्म को प्राप्त किये हुए आत्माराम परमहंसों को ‘श्री परमहंस’ बनाने के लिए भगवान का अवतार होता है। यानि परमहंसों को प्रेमरस परिप्लुत करने के लिए सगुण साकार भगवान के अवतार हुए। भगवान के अवतार काल में साधारण मायाबद्ध मनुष्य तो उनकी दिव्य लीलाओं का रहस्य न समझ सकने के कारण लाभ नहीं ले पाते लेकिन सनकादिक, जनकादिक, शुकादिक जैसे बड़े-बड़े परमहंस भगवान के साकार स्वरूप के दीवाने हो जाते हैं। तो भगवान ने अपने निराकार स्वरूप के प्रेमियों को और सरस प्रेमरस पिलाने के दृष्टिकोण से भी अवतार लिया, साथ ही उन्हें यह भी सिद्ध करने का अवसर मिल गया कि मेरे निराकार और साकार दोनों स्वरूप एक ही हैं, तभी तो परमहंस बरबस विभोर हो जाते हैं –

बरबस ब्रह्म सुखहिं मन त्यागा

 

क्योंकि उन्हीं का निराकार ब्रह्म साकार बन कर आया है इसीलिए आकृष्ट होते हैं। लेकिन संक्षेप में हमें सदा-सदा के लिए यह समझ लेना चाहिए कि ईश्वर के अवतार का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कारण ईश्वर की अकारण करुणा ही हो सकती है। क्योंकि जिसका किसी से राग-द्वेष नहीं है एवं जो अपने में ही तृप्त और आत्माराम पूर्णकाम है, उसका स्वयं का कोई स्वार्थ हो ही नहीं सकता। उसका सब कार्य परार्थ ही होगा।


आत्म
प्रयोजनाभावे परानुग्रह एव हि

(लिंग पुराण)

भगवान का अकारण करुणा का  स्वभाव जगत विख्यात ही है, उसी स्वभाव के कारण उनके अवतार एवं प्रत्येक लीला इत्यादि होते हैं –


मुख्यं
तस्य हि कारुण्यं

(शांडिल्य सूत्र)

अवतार लेने से भगवान के सगुण साकार स्वरूप संबंधी अनंत नाम, अनंत गुण, अनंत लीलादि का प्राकट्य हुआ जिसके अवलम्बन  के द्वारा अनंतानंत मायिक पामर जीव भी भव सागर से उत्तीर्ण होकर प्रेम रसार्णव में निमग्न हो रहे हैं। इसी आशय से वेदव्यास जी ने कहा –

भवेस्मिन् क्लिश्यमानानामविद्या काम कर्मभिः
श्रवणस्मरणार्हाणि करिष्यन्निति केचन

(भागवत : 1-8-35)

 

अर्थात् सगुण साकार संसार को व्यवहार में लाते-लाते जीवों का स्वभाव बन गया है कि उनके मन की रुचि सगुण साकार तत्त्व में ही होती है। अतएव भगवान ने अवतार लेकर सगुण साकार वातावरण दे दिया। जिसके परिणामस्वरूप अनंतानंत जीवों का कल्याण हो रहा है। वह अवतार लेकर जीवों के साथ जो अपनी करुणा इत्यादि का क्रियात्मक परिचय देते हैं उसे सुनकर जीवों को साहस होता है एवं जीव अनन्य विश्वासयुक्त होकर ईश्वर की ओर तेजी से बढ़ते हैं।

 

#सुश्री श्रीधरी दीदी (प्रचारिका, जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज)